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गले मिलने को आपस में दुआएँ रोज़ आती हैं- मुनव्वर राना

July 7th, 2016 | by admin
गले मिलने को आपस में दुआएँ रोज़ आती हैं- मुनव्वर  राना
शायरी
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गले मिलने को आपस में दुआएँ रोज़ आती हैं
अभी मस्ज़िद के दरवाज़े पे माएँ रोज़ आती हैं

अभी रोशन हैं चाहत के दीये हम सबकी आँखों में
बुझाने के लिये पागल हवाएँ रोज़ आती हैं

कोई मरता नहीं है, हाँ मगर सब टूट जाते हैं
हमारे शहर में ऎसी वबाएँ रोज़ आती हैं

अभी दुनिया की चाहत ने मिरा पीछा नहीं छोड़ा
अभी मुझको बुलाने दाश्ताएँ रोज़ आती हैं

ये सच है नफ़रतों की आग ने सब कुछ जला डाला
मगर उम्मीद की ठंडी हवाएँ रोज़ आती हैं

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बात करनी है बात कौन करे

अब कौन किसको समझाए कहाँ तक

टू कहाँ जायेगी कुछ अपना ठिकाना कर लें

ये न थी हमारी किस्मत की विसाले यार होता

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