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स्वार्थ लागि करै सब प्रीति

February 6th, 2017 | by admin
स्वार्थ लागि करै सब प्रीति
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गोप कुमार मिश्र*

हम स्वार्थ को ही प्रीति समझ बैठे है**** फिर कहते है उसनें मेरा दिल
तोड दिया**** अरे हमारे दिल जुडे कहाँ थे**** जुडे थे स्वार्थ और स्वारथ टूटते ही है****
प्रीति द्वे कहाँ रहने देती वो एक कर देती है**** प्रेम गली अति सांकरी जामें द्वे न समाय**
* प्रेम में वोह वो नही रहता मै तो रहता ही नही*** फिर दिल नही टूटता**टूटता भी तो
मलाल नही होता***** क्यों कि हम स्वयम् मे ढूढते***** उस स्वार्थ रूपी मय को****
जिसनें बिलग किया है***** समर्पण में कमीं को ढूंढते**** एक उदाहरण याद आ रहा है
कहते है कृष्ण के दर्द उठा पेट में**** श्याम से ही पूछा गया *** इसकी दवा क्या है
कृष्ण नें कहा कि अगर किसी भक्त की चरण धूलि मिल जाय*** तो दर्द जा सकता है***
वहाँ पर रुक्मिणी थी सत्य भामा थी नारद भी मौजूद थे***** नारद औषधि लानें पूरे
बृम्हाण्ड में भागे **** पर सबको नरक जानें का डर*** कोई चरण धूलि देनें को तैयार नही
आखिर में गोपिया मिली उन्होंनें कहा लो अभी ले जाओ***** नारद नें कहा
तुम्हे नरक जानें का डर नही** गोपियों नें कहा श्याम ठीक होना चाहिए**** हम जन्म
जन्मांतर नरक में रहने के लिए तैयार**उनके दर्द की पीडा जो मेरे उर में हो रही है****
* उससे भयानक नरक की पीडा क्या होगी
ये है प्रेम*** प्रेम परमार्थी होता है स्वार्थी नही

gop
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